उर्व्यां कोऽपि महीधरो लघुतरो दोर्भ्यां धृतो
लीलया तेन त्वं दिवि भूतले च सततं गोवर्धनो गीयसे ।
त्वां त्रैलोक्यधरं वहामि कुचयोरग्रे न तद्गण्यते
किं वा केशव भाषणेन बहुना पुण्यैर्यशो लभ्यते ॥
| Word | Transliteration | English | Hindi | Category | Gender | Number | Case |
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