जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु स्फुटतरं योऽसौ समुज्जृम्भते
प्रत्यग्रूपतया सदाहमहमित्यन्तः स्फुरन्नैकधा ।
स्फुरन्नेकधा नानाकारविकारभागिन इमान् पश्यन्नहन्धीमुखान्
नित्यानन्दचिदात्मना स्फुरति तं विद्धि स्वमेतं हृदि || 217 || ॥
| Word | Transliteration | English | Hindi | Category | Gender | Number | Case |
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