सम्बोधमात्रं परिशुद्धतत्त्वं स्वं बोधमात्रं
विज्ञाय सङ्घे नृपवच्च सैन्ये ।
तदाश्रयः स्वात्मनि सर्वदा स्थितो तदात्मनैवात्मनि
विलापय ब्रह्मणि विश्वजातम् || 265 || ॥
| Word | Transliteration | English | Hindi | Category | Gender | Number | Case |
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