ज्ञाते वस्तुन्यपि बलवती वासनाऽनादिरेषा
कर्ता भोक्ताप्यहमिति दृढा याऽस्य संसारहेतुः ।
प्रत्यग्दृष्ट्याऽऽत्मनि निवसता सापनेया प्रयत्नान्
मुक्तिं प्राहुस्तदिह मुनयो वासनातानवं यत् || 267 || ॥
| Word | Transliteration | English | Hindi | Category | Gender | Number | Case |
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