वैराग्यान्न परं सुखस्य जनकं पश्यामि वश्यात्मनः
तच्चेच्छुद्धतरात्मबोधसहितं स्वाराज्यसाम्राज्यधुक् ।
एतद्द्वारमजस्रमुक्तियुवतेर्यस्मात्त्वमस्मात्परं
सर्वत्रास्पृहया सदात्मनि सदा प्रज्ञां कुरु श्रेयसे || 376 || ॥
| Word | Transliteration | English | Hindi | Category | Gender | Number | Case |
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