विवेकचूडामणि - 508

Verse 508

चलत्युपाधौ प्रतिबिम्बलौल्य
मौपाधिकं मूढधियो नयन्ति
स्वबिम्बभूतं रविवद्विनिष्क्रियं
कर्तास्मि भोक्तास्मि हतोऽस्मि हेति || 508 || ॥

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